श्री राम ने धनुष भंग कर सीता को किया वरण

बक्सर अप टू डेट न्यूज़:विजयादशमी महोत्सव के आठवें दिन रामलीला में सीता स्वयंवर व धनुष यज्ञ प्रसंग का मंचन किया गया।जिसमें श्रीराम धनुष भंग कर सीता को वरण कर लिए।

इस प्रसंग में दिखाया गया कि राजा जनक भगवान शिव से धनुष लेकर महल में आते हैं और प्रति दिन उसकी पूजा करते हैं।उसी बीच एक दिन राजा जनक किसी कार्य वश महल से बाहर होते हैं, उस दिन महारानी धनुष की पूजा करना भूल जाती है।यह देखकर सीता जी अपने एक हाथ से धनुष को उठाकर वहां गोबर का चौका लगाती है और उसका पूजन करती है।यह बात राजा जनक सुनकर उसी समय स्वयंवर की घोषणा करते हुए कहते हैं कि जो राजा इस धनुष का खंडन करेगा उसी से सीता का विवाह होगा।

सभा में विश्वामित्र के संग श्रीराम और लक्ष्मण भी आते हैं। जनक जी उनको उच्चासान पर बिठाते हैं। एक-एक कर सभी राजा धनुष उठाने का प्रयास करते हैं और असफल हो जाते हैं।सभी राजाओं को धनुष उठाने में विफल होते देख जनक जी क्रोधित होते हैं और पृथ्वी को वीरों से ही खाली बता देते हैं।

राजा जनक के इस कड़वे वचन को सुन लक्ष्मण जी खड़े होकर जनक जी के ऐसे वचन बोलने का विरोध करते हैं। तब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्रीराम खड़े होते हैं और धनुष का खंडन करते है। धनुष के खंडन होने पर जानकी जी श्रीराम के गले में वरमाला पहनाती हैं।

इसके पूर्व कृष्ण लीला के दौरान मथुरा वृंदावन के कलाकारों द्वारा ‘चंद्रावली छलन दान लीला’ का मंचन किया। जिसमें दिखाया गया कि भगवान श्रीकृष्ण के साथ रहने वाले ग्वाल बाल बरसाना के जंगल में गाय चराने जाते हैं। इस दौरान भूख लगने पर निकट के गांव रिठौरा निवासी गोपी चंद्रावली के यहां पहुंचकर माखन और मिश्री का दान मांगते है।

लेकिन चंद्रावली घर में रखा माखन मिश्री के साथ-साथ अन्य व्यंजनो को देने से मना कर देती है। इसकी जानकारी ग्वाले अपने सखा श्रीकृष्ण को देते है। श्रीकृष्ण अपना मोहिनी रूप बदलकर चंद्रावली की बहन के रूप में घर पहुंचते है। जिसकी अतिथि सत्कार में 56 भोग, 306 व्यंजन तैयार करती है। उसके बाद भगवान श्रीकृष्ण घर में रखे सारे व्यंजन, माखन, मिश्री खा जाते है। यह देखकर वह आश्चर्य चकित हो जाती है। भगवान श्रीकृष्ण अपने स्वरूप में आकर कहते है कि चंद्रावली मैने तुम्हें छलने के लिए यह रूप धारण किया था। कभी किसी भूखे को अपने घर से झूठ बोलकर वापस नहीं भेजना चाहिए। तुमने मेरे ग्वाले साथियों द्वारा भूख लगने पर माखन, मिश्री दान नहीं दिया था। यह प्रसंग देख श्रोतागण भाव-विभोर हो गए।

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